भारत में मानसिक देखभाल के लिए साइकोड्रामा की आवश्यकता क्यों है?
- reachingloveandlig
- Jul 30, 2023
- 5 min read
नमस्ते,
मेरा नाम वर्तिका है और यह बताने से पहले की इस पेज का क्या उद्देश्य है, मैं यह बताना चाहूंगी की मैं इस निर्णय पर क्यों और कैसे पहुंची। आप चाहे तो कहानी को छोड़ अंत पर जा सकते है, लेकिन क्युकी मैं प्रक्रिया पर ही काम करती हूं, तो मैं वहीं से शुरू करूंगी...
कैसे और क्यों?
पिछले कुछ महीनों में मैंने काम को ले कर, अपने अस्तित्व को ले कर खुद से कहीं सवाल किए, इतनी सारी चीज़े करी कि मुझे दिन भर में पर्याप्त भोजन करने का भी समय नहीं मिल पाता था, और फिर एक दिन मैंने अपने इस अनुभव के बारे में सोचा:
जब मैं तैरना सीख रही थी तब मैं हमेशा सीढ़ियों से नीचे उतरती था, मैंने अलग-अलग गहराइयों में,
सभी शैलियां और स्ट्रोक्स सीख रखे थे, मैं कई सारे लैप्स भी लगा लेती थी लेकिन जब पापा मुझे डाइविंग बोर्ड से कूदने के लिए कहते थे तो मेरा दिल तेजी से धड़कने लग जाता था। कई दिनों तो मैं डाइविंग बोर्ड पर जाती भी थी, थोड़ी देर वही खड़ी हो कर वापस सीढ़ियों से नीचे आ जाती थी...
हालाँकि मैं तैरना जानती थी, मैं जानती थी कि खुद को कैसे बचाना है, कितने कदम उठाने है, शरीर को कैसे रखना है पर फिर भी मैं डाइव लगाने से डरती थी। फिर एक दिन, जब मैं डाइविंग बोर्ड पर खड़ी अपनी सोच में गुम थी तब ही पापा ने नीचे से मुझे आवाज लगाई...जैसे ही मैने उन्हे देखने के लिए नीचे मुंह करा मेरे भाई ने मुझे झट से धक्का दे दिया। मैं पूल में ऐसी पहुंची जैसे पहले कभी नहीं पहुंची थी। मेरे चारों तरफ पानी, धक्का लगने के कारण सिर की टोपी कहीं खो गई थी, लंबी गहरी सांस लेकर जब मैं ऊपर आई, आंखों में आंसू थे और पास में हर कोई खुशी मना रहा था। मैं किनारे की ओर गई और पानी से बंद नाक में भी खुद से कहा, "तू ने कर दिखाया, वर्तिका, हम कूद गए, हम जिंदा है, पहले से कहीं ज्यादा"।
हर दिन जैसे जैसे मैं जी रही हूं, मेरे मन में अपने बारे में, मौजूद सच्चाइयों और मेरे द्वारा पैदा किए गए संदेहों के बारे में सवाल उठने लगे हैं कि वे किस लिए हैं? जब मैं तैरना जानती हूँ, तब भी मैं डाइव मारने से क्यों डरती हूँ? अपने काफी करीबी लोगों, गुरुओं से चर्चाओं के बाद, और आत्म-संदेह के विचारों से लड़ते लड़ते मैंने अंततः डाइव मारने का फैसला लिया है और इसलिए मैं यहाँ हूँ...
मुझे हमेशा लोगों, स्थानों, विचारों, कहानियों, हमारे द्वारा निभाई जाने वाली भूमिकाओं, हमारे द्वारा किए जाने वाले व्यवहारों पर विचार विमर्श
करना बेहद पसंद है खास कर उन पर जो हम अक्सर अभिव्यक्त नहीं कर पाते। अपने पोस्ट ग्रेजुएट कोर्स, नैदानिक मनोविज्ञान, के लिए जब मैं अस्पतालों में और साथ ही यूनिसेफ के साथ थिएटर असिस्टेंट के रूप में काम करने के दौरान, मुझे अपने विज़न का पता चला, मुझे जीवन में क्या करना है और मैं क्या कर सकती हूं उस का पता चला...
और मुझे पता चला कि कहानियों से ज्यादा, जिस चीज़ ने मुझे आकर्षित किया वह पात्र थे। मेरी जिज्ञासा नाटक के कथानक में नहीं थी, बल्कि यह थी कि पात्रों ने कथानक को कैसे तैयार किया... मैं पिछले 5 वर्षों से मानसिक स्वास्थ्य पर कला प्रदर्शन और थिएटर का अभ्यास कर रही हूं। विशेष रूप से बच्चों, किशोरों और उन लोगों के साथ जिन्हें मानसिक स्वास्थ्य के बारे में कोई जानकारी नहीं है या जो इसे एक विदेशी अवधारणा के रूप में सोचते हैं।
मै कौन हूँ ?

मैं एक साइकोड्रामेटिस्ट हूं और अभी भारत में काम कर रही हूं। एक साइकोड्रामेटिस्ट थिएटर तकनीक का उपयोग करते हुए लोगो की मानसिक देखभाल के लिए काम करता है, मेरी योग्यता गेस्टाल्ट और साइकोड्रामा थेरेपी में विशेषज्ञता के साथ क्लिनिकल साइकोलॉजी में पोस्ट ग्रेजुएशन है। मेरे पास स्कूल, संगठनात्मक और नैदानिक सेटिंग्स में काम करने का अनुभव है और मैं, विकास के दो सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र, शैक्षिक और सामाजिक क्षेत्रों की बेहतरी के लिए काम करते रहना चाहती हूं।
यह पेज किस लिए है?
• थिएटर, थेरेपी और उनके मिलाप में अपनी सीख, अनुभव और अवलोकन साझा करना।
• लोगों को मेरी दृष्टिकोण को समझने में मदद करना और फिर अगर वे साथ काम करना चाहते हैं तो उन तक पहुंचना।
मैं क्या करती हूं?
मानसिक स्वास्थ्य देखभाल और समग्र कल्याण के इरादे से मनोवैज्ञानिक तकनीकों को शामिल कर के, समूहों और व्यक्तियों के साथ, भावनाओं, व्यवहार और कार्यों के बारे में जागरूकता, स्वीकृति, विकल्पों की खोज और पुनर्गठन क्षमताओं को प्राप्त करने में मदद प्रदान करती हूं।
क्षेत्र: शैक्षिक, सामाजिक, संगठनात्मक।
प्लेटफ़ॉर्म: ऑनलाइन/ऑफ़लाइन
मैं यह क्यों कर रही हूं ?
मानसिक स्वास्थ्य एक अवधारणा के रूप में तो भारत में आ गया है, कुछ लोग इसके बारे में जानते हैं और कुछ नहीं। जो लोग इसके बारे में नहीं जानते, उनके लिए मेरा उद्देश्य उन्हें इसके अस्तित्व और इसकी आवश्यक के बारे में जागरूक करना है। जो लोग पहले से ही जानते हैं, उनकी यह समस्या दूर करनी है, अक्सर होता यूं है की वह इसे एक वर्जित शब्द के रूप में सोचते हैं, न केवल जो लोग थेरेपी लेते हैं उन को अलग दिशा से देखते है बल्कि मानसिक स्वास्थ्य को तभी तवजो देते है जब वह बदतर हो जाए।
स्कूलों, संगठनों और कई अन्य क्षेत्रों में हमने लोगों की मदद के लिए मनोचिकित्सको को नियुक्त किया है, लेकिन समस्या ममानसिक स्वास्थ्य देखभाल पेशेवरों के 'नहीं होने' की नहीं है, बल्कि लोगों की वहां जाने की क्षमता/स्वीकार्यता की है। भारत में बहुत सारे लोग हैं ऐसे है जिन्हें अपने मानसिक स्वास्थ्य के लिए मदद की ज़रूरत है, दूसरा, हमारे पास बहुत सारे पेशेवर हैं जिनके पास डिग्री, विशेषज्ञता, अनुभव है लेकिन फिर भी हाथ में कोई काम नहीं है। मुझे लगता है कि कठिनाई समस्या या समस्या के समाधान में नहीं है, हमारे पास पर्याप्त समस्याएं और पर्याप्त समाधान हैं लेकिन फिर भी हम इन दोनों को मिलाने में असमर्थ हैं। तीसरा, लोगों का मानना है कि मानसिक स्वास्थ्य देखभाल एक 'पश्चिमी अवधारणा' है, जिसका मुख्य कारण अंग्रेजी के शब्दों और शब्दावली से जुड़ा है, जिससे हर कोई अच्छी तरह वाकिफ नहीं है। भारत विविध संस्कृतियों का देश है और इसीलिए यहां विविध भाषाएँ भी आती हैं।
इन चीजों के हल में हीं आता है मेरा दृष्टिकोण और मैं जो काम करती हूं, यह काम समूह कार्यशालाओं और व्यक्तिगत एसत्रों के संचालन के माध्यम से लोगों को खुद के नज़दीक, उनकी जरूरतों, उनकी क्षमताओं का पता लगाने में मदद करता है। मेरी यह कोशिश रहेगी की मैं हिंदी और अंग्रेजी दोनों ही भाषाओं को शामिल करूं, ताकि कुछ तरीकों से भाषा की बाधा को कम किया जा सके।
कभी-कभी हो सकता है आपको मनोचिकत्सक से मदद लेने की आवश्यकता हो और कभी नहीं, लेकिन हम निर्णय तभी ले पाएंगे जब हम खुद से सच होंगे, खुद को समय देंगे, सभी रूपों में, चाहे वह आनंददायक हो या नहीं, और यह करना जरूरी है वहां पहुंचने के लिए जहां हम वास्तव में रहने के योग्य हैं।
इसलिए, यदि आप चाहते हैं कि आप, आपके मित्र, परिवार, या आपकी टीम/संगठन/संस्थान/समुदाय जिन्हें सहायता की आवश्यकता है/मानसिक स्वास्थ्य देखभाल, समग्र कल्याण के बारे में जागरूक हों और व्यक्तिगत और पेशेवर दोनों रूप से अपने प्रदर्शन को बढ़ाएं, तो आप मुझ से जुड़ सकते है, हम किस तरह से साथ काम कर सकते है इस बारे में बात कर सकते है।
मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि यह बात हजारों लोगों तक पहुंचती है या नहीं, अगर यह अपने भीतर प्रकाश की खोज करने वाले एक भी इंसान तक पहुंच पा रही है तो इसका उद्देश्य पूरा होगा।




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